“मैंने अपने लिए जो जीवन धर्म चुना है, वो उस परोपकारी योद्धा का जीवन-धर्म नहीं है जो लोगों को कठिन परिस्थितियों से छुटकारा दिलाने के लिए सर्वत्र घूमता रहता है. मैं लोगों के सामने ऐसे उदाहरण पेश करने का विनम्र प्रयास करता हूं, जिनसे कि वे अपनी कठिनाइयां स्वयं हल करना जान सकें. – महात्मा गांधी

महात्मा गांधी ने अपने जीवन में लगातार ये प्रयास किया कि उनके साथ काम करने वाले ही नहीं, बाकी के सभी लोग भी कमोवेश अपने निर्णय स्वयं ले सकें. जब वे जनवरी 1915 में भारत लौटे तो उस समय की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी से निपटने के लिए, उन्होंने सरकार या उद्योगपतियों की ओर हाथ नहीं बढ़ाया, बल्कि यह कोशिश की, कि चरखे, करधे और अन्य छोटे कुटीर और ग्रामोद्योगों के माध्यम से सामान्य जनसमुदाय आत्मनिर्भर हो सके.

उसे किसी की ओर मुंह नहीं ताकना पड़ें. वे एक ऐसे व्यक्तित्व थे जो एक ही समय दुनिया की जटिलतम समस्याओं से और आश्रम में राशन व्यवस्था की पूर्ति की समस्या से उलझते रहते थे और दोनों को एक सा महत्व देते थे. उनके समकालीन कई बार उनकी इस प्रवृत्ति से खीज भी उठते थे, परन्तु वे इस सबसे अविचलित ही रहते थे. वास्तविकता यही थी कि उनकी कथनी और करनी में अंतर नहीं था और उनका आचरण इतना पारदर्शी है कि वो कई बार डर सा पैदा कर देता है.

जहां दुनिया के तमाम विशिष्टजन उनके सानिध्य को ललचाते थे, वहीं गांधी बारीसाल (अब बांग्लादेश में) में वैश्याओं के साथ लंबी बैठक करते हैं, उन्हें बहन कह कर संबोधित करते हैं. उनके प्रभाव को उनके इस प्रश्न के उत्तर में आंका जा सकता है. वे उनसे पूछते हैं: मैं, कहूं वह काम आप करेंगी? “उन्हें उत्तर मिलता है.” आप क्या कहना चाहते हैं, सो हम जानती हैं. हममें से अनेक ने सूत कातना प्रारंभ कर दिया है. परंतु उससे पेट नहीं भरता. इस घटना से उनके प्रभाव की व्यापकता का अंदाजा लगता है.

शहरी व सामान्य ग्रामीणों के पास सूचनाओं के आदान-प्रदान और विश्लेशण का एक नजरिया होता है. वे अनेक माध्यमों से लगातार गांधी और गांधी विचार के संपर्क में रहते हैं. परंतु समाज में सबसे ज्यादा उपेक्षित ये बहने गांधी से मिलने से पहले उनके विचारों से परिचित हैं. आजादी की लड़ाई में उनके सबसे महत्वपूर्ण औजार चरखे से वे परिचित हैं, और चरखा को अपना कर स्वतंत्रता संघर्श में सीधा योगदान दे रही हैं. गांधी भी उनसे मिलते हैं. दुरभाषिये के माध्यम से उनसे वार्तालाप करते हैं.

वहां 11 महिलाएं उस पेशे को छोड़ उनके साथ आ जाती हैं. गांधी खुले हदय से उन्हें अपनाते हैं. क्या मानव इतिहास में इतनी व्यापक और गहरी पैठ वाला कोई दूसरा व्यक्ति हुआ है? दूसरी ओर वे अपने द्वारा लिखे गए हिटलर को पत्र में तमाम नसीहतें देने के बाद बहुत स्पष्ट तौर पर उससे कहते हैं, कि इस विश्व विजय के सपने का अंत तुम्हारे अपने ही बनाए हथियार से होगा. त्रासदी यही है कि हिटलर जो कि विश्व विजेता होने का सपना देख रहा था, को अंततः आत्महत्या ही करना पड़ी थी.

गांधी अध्ययन से यह भी समझ में आता है, कि जिस दौर में सबसे सघन हिंसा होती है उसी दौर में अहिंसा सबसे कारगर होती है. भारत में गांधी की सक्रीयता सन् 1915 से सन् 1948 यानी करीब 33 वर्ष रही. इनके बीच का काल सर्वाधिक हिंसक काल भी है. इसी दौरान दो विश्व युद्ध हुए, जिनमें करोड़ों लोग मारे गए. ये मानव इतिहास की भीषणतम त्रासदियां हैं. इतना ही नहीं इसी बीच सन् 1917 में रूस में बोल्शेविक क्रांति हुई. इसका आधार भी हिंसा था और एक नई व सर्वहारा आधारित शासन व्यवस्था भी सामने आई.

गांधी बनाम लेनिन जैसी तुलनाएं भी हुई. परंतु गांधी जी का अहिंसा पर से विश्वास एक क्षण को भी नहीं डिगा. उन्होंने तब कहा था कि मैं रूसी क्रांति को अधिकतम 75 वर्ष देता हूं. हम जानते हैं, ये शासन व्यवस्था 74 वर्ष में ढह गई. गांधी समाजवादी सिद्धांतों के विरोधी नहीं थे, परंतु, वे किसी भी सूरत में हिंसा को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे. वे अहिंसा को बेहद व्यापक संदर्भों में प्रयोग में लाते थे. उनकी अर्थव्यवस्था की परिकल्पना और विकास की अवधारणा में हिंसा का कोई स्थान नहीं था.

बढ़ती यांत्रिकता उन्हें एक शताब्दी पहले ही विचलित कर रही थी. वे इनमें निहित हिंसा को बहुत अच्छे से समझ चुके थे. हम आज देख ही रहे हैं कि छोटे और स्वरोजगार धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं. कृषि में बढ़ती यांत्रिकता और कृत्रिमता, जिसमें बीज, रासायनिक खाद और कीटनाशक शामिल हैं, ने खेती की कमर तोड़ डाली है. भूमि बंजर हो रही है और पिछले 15 वर्षों में 3.50 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं. क्या हमने सोचा था कि खेती-किसानी का ऐसा हिंसक स्वरूप हमें अपने जीवनकाल में देखने को मिलेगा.

जबकि गांधी जी का मानना था कि “जिसे अहिंसा का पालन करना है, सत्य की आराधना करनी है, ब्रहमचर्य को स्वाभाविक बनाना है, उसके लिए तो शरीरश्रम रामबाण हो जाता है. ये श्रम वास्तव में देखा जाए तो खेती से ही संबंध रखता है. पर आज की जो स्थिति है, उसमें सब उसे नहीं कर सकते इसलिए खेती का आदर्श ध्यान में रखकर आदमी बदले में दूसरा श्रम-जैसे कताई, बुनाई, बढ़ईगिरी, लुदारी इत्यादि कर सकता है. परंतु आज स्थितियां ठीक विपरित हैं.

भारत में शारीरिक श्रम करने वाले को हेय दृष्टि से देखा जाता है. आज हम ऐसे समय में हैं, जब बेरोजगारी पिछली आधी शताब्दी में सबसे ज्यादा है. अर्थव्यवस्था का आकार दिन दूना रात चैगुना बढ़ रहा है. लेकिन उद्योग बंद हो रहे हैं, बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है. हमें इस विरोधाभास पर गंभीरता से विचार करना होगा. सोचना होगा कि इस वैश्विक अर्थव्यवस्था में ऐसा क्या हैं कि महज 24 घंटे में शेयर बाजार आसमान की ऊंचाई को पा लेता है और 24 घंटे में पाताल की गहराई में चला जाता है.

इस अवास्तविकता को हर हाल में समझना होगा और इससे निपटना भी होगा. ये तभी संभव है कि जब हम इस सट्टेबाजी से बाहर निकल कर श्रम की महत्ता को समझ पाएंगे और दूसरों को समझा पाएंगे. ये आसान नहीं है. परंतु हमें समझ लेना होगा कि वर्तमान जलवायु परिवर्तन व बढ़ते तापमान से नष्ट होती हमारी पृथ्वी को यदि बचाना है तो, गांधी को अपनाना ही एकमात्र विकल्प है. गांधी जी कहते हैं, “हमारी पीढ़ी के पिछले दो महायुद्धों ने आज की आर्थिक व्यवस्थाओं का पूरा दिवालियापन सिद्ध कर दिया है.

संयोगवश इन दो महायुद्धों ने मेरी दृष्टि से युद्ध का भी दिवालियापन सिद्ध कर दिखाया है.” दूसरे महायुद्ध के पश्चात ये विचार सामने आया था कि, हमने इतनी वीभत्स हिंसा देख ली है, तो क्या हम कह सकते हैं कि अहिंसा का युग प्रारंभ हो गया है ? हम सबको लगा था कि संसार को अब समझ में आ जाएगा कि अब अहिंसा के नामक अनुपम भेंट, जिसे सामान्यतया बेहद व्यक्तिगत गुण के रूप में लिया जाता था, उसका व्यापक प्रयोग होगा. जैसा कि महात्मा गांधी ने भारत की आजादी के संदर्भ में किया भी.

परंतु आज परिस्थतियों ने नया मोड़ ले लिया है. श्रीलंका से म्यांमार, बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान, चीन, अफगानिस्तान, ईरान, ईराक, सीरिया और तुर्की तक अपने-अपने स्वार्थों के चलते हिंसा के पोशक या निर्यातक बन गए हैं. ये अधिकांश राष्ट्र आंतरिक अल्पवस्था और हिंसा का शिकार होते जा रहे हैं. जबकि गांधी मानते थे, “जाग्रत व स्वतंत्र भारत के पास हिंसा से कराहती दुनिया के लिए शांति और सद्भावना का संदेश है.” क्या आज हम दिल पर हाथ रखकर सच्चाई से उनके इस कथन का समर्थन कर सकते हैं ?

बापू का भारतीय सभ्यता पर अटल विश्वास था. तभी तो उन्होंने कहा था, “अपने हृदय की गहराइयों में मैं अनुभव करता हूं कि युद्ध में होने वाले भयंकर मानव-संहार के कारण दुनिया आज मृत्यु के कगार पर खड़ी हो गई है. दुनिया इस स्थिति से बाहर निकलने का मार्ग खोज रही है और मैं यह विश्वास करने का साहस करता हूं कि शांति की भूखी दुनिया को इस विकट परिस्थिति से बाहर निकलने का मार्ग बताना शायद भारत की इस प्राचीन भूमि का विशेष अधिकार होगा.”

पर हम तो 2 अक्टूबर को करुणा के प्रतीक बुद्ध के नाम से परमाणु विस्फोट करते हैं. उम्मीद करते हैं कि बापू की 150वीं जयंती के समारोह हमें नए सिरे से अहिंसा और सत्य के बारे में विमर्श को बाध्य करेंगे. सुदूर संयुक्त राष्ट्रसंघ में 16 वर्षीय ग्रेटा थनबर्डा ने वर्तमान भाग्य-विधाताओं की चेताते हुए, जिस सत्य को उजागर किया है, वो महात्मा गांधी का विस्तार है और अगली पीढ़ी में हस्तांतरित हो रहा है.

याद करिए गांधी ने कहा भी था, “यदि मैं मानव परिवार के मन में यह आस्था उत्पन्न करने में सफल रहा कि प्रत्येक पुरुष या स्त्री भले ही वह शरीर से कितना ही निर्बल क्यों न हो, आत्मगौरव तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षक है, तो मेरा काम संपन्न हो जाएगा. यदि समूचा विश्व भी व्यक्तिगत सत्याग्रही के विरूद्ध खड़ा हो जाए तो भी सत्याग्रही इनकी रक्षा करने में सफल होगा.”

Tags:
COMMENT